प्रधान न्यायाधीश पर जूता फेंकने वाले वकील राकेश किशोर पर अवमानना की कार्रवाई होगी, अटॉर्नी जनरल ने दी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट में पेश आए अभद्र व्यवहार को लेकर होगी सख्त कानूनी कार्रवाई, सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने जताई कड़ी नाराजगी

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर। सर्वोच्च न्यायालय में अभूतपूर्व घटना के बाद अब कानून के दायरे में कड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) बी. आर. गवई पर जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर के खिलाफ कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई शुरू की जाएगी।

इस मामले में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अवमानना की कार्यवाही पर अपनी औपचारिक सहमति दे दी है। यह सहमति सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह की याचिका पर दी गई है।


🔹 सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन ने मांगी थी कार्रवाई की अनुमति

बार एसोसिएशन अध्यक्ष विकास सिंह ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कहा था कि

“वकील राकेश किशोर द्वारा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश न केवल अदालत का अपमान है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की गरिमा पर सीधा प्रहार है।”

उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि आरोपी वकील ने घटना के बाद कोई पछतावा नहीं दिखाया और अपने व्यवहार को उचित ठहराने की कोशिश की।

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🔹 6 अक्टूबर को हुई थी घटना — पुलिस ने मौके पर पकड़ा

यह घटना 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान हुई थी।
71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की ओर जूता फेंका, जो उनके पास तक नहीं पहुंच सका।

कोर्ट रूम में मौजूद दिल्ली पुलिस के एक कॉन्स्टेबल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए राकेश किशोर को पकड़ लिया।
पुलिस जब उसे कोर्ट रूम से बाहर ले जा रही थी, तो उसने ज़ोर से नारा लगाया —

“सनातन धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान।”

यह नारा और वकील का रवैया अदालत के प्रति न केवल अशोभनीय बल्कि अमाननीय माना गया।


🔹 भगवान विष्णु पर टिप्पणी से आहत था आरोपी वकील

जानकारी के अनुसार, राकेश किशोर प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई के एक पुराने बयान से आहत था, जिसमें उन्होंने कथित रूप से भगवान विष्णु को लेकर टिप्पणी की थी। इसी के विरोध में उसने कोर्ट में जूता फेंकने जैसा कृत्य किया।

हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी न्यायिक टिप्पणी या विचार से असहमति जताने का यह तरीका कानूनी मर्यादाओं और वकालत की गरिमा के खिलाफ है।


🔹 कोर्ट और वकील संगठनों ने की निंदा

इस घटना की सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) और अन्य वकील संगठनों ने कड़ी निंदा की थी।
कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कहा कि इस तरह की हरकत पूरे वकील समुदाय की साख को धूमिल करती है और न्यायपालिका पर हमला करने के समान है।

वकील संगठनों ने इस घटना के विरोध में अदालत के बाहर प्रतीकात्मक प्रदर्शन भी किया था और मांग की थी कि राकेश किशोर को बार काउंसिल से निष्कासित किया जाए।


🔹 क्या है कोर्ट की अवमानना?

भारतीय कानून के अनुसार, ‘कोर्ट की अवमानना’ (Contempt of Court) वह अपराध है, जिसमें कोई व्यक्ति अदालत की गरिमा, अधिकार या आदेश का अपमान करता है या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालता है।

सुप्रीम कोर्ट के पास अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति को दंडित कर सके, जो न्यायालय की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाए।

राकेश किशोर के खिलाफ यह कार्यवाही अब सीधे सुप्रीम कोर्ट में शुरू होगी। इसमें दोषी पाए जाने पर उन्हें छह महीने की सजा या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।


🔹 अटॉर्नी जनरल की सहमति के बाद आगे की प्रक्रिया

अटॉर्नी जनरल की अनुमति के बाद अब सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन अदालत में औपचारिक अवमानना याचिका दायर करेगी।
इसके बाद न्यायालय आरोपी वकील को नोटिस जारी कर सकता है और मामले की सुनवाई तय होगी।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला “कोर्ट की गरिमा और अनुशासन” से जुड़ा है, इसलिए न्यायालय इसे उच्च प्राथमिकता के साथ देखेगा।


🔹 अदालत की मर्यादा सर्वोपरि — वरिष्ठ न्यायविदों की प्रतिक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ता सोलि सोराबजी के सहयोगी रहे एक वकील ने कहा—

“यह मामला किसी व्यक्तिगत भावना का नहीं, बल्कि संस्था की गरिमा का है। यदि वकील ही कोर्ट पर हमला करेंगे, तो न्यायिक स्वतंत्रता की नींव हिल जाएगी।”

पूर्व अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने भी कहा था कि न्यायपालिका के प्रति इस तरह के व्यवहार को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।


🔹 वकील समुदाय में चर्चा — 71 वर्ष की आयु में भी ‘चरमपंथी’ रुख

कई वकीलों ने यह सवाल उठाया है कि 71 वर्षीय वरिष्ठ वकील द्वारा ऐसा कदम उठाना न केवल अविवेकपूर्ण बल्कि वकालत के शपथ-पत्र की आत्मा के खिलाफ है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने संकेत दिए हैं कि अदालत की कार्यवाही के साथ-साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।


यह मामला केवल एक व्यक्ति के अनुचित व्यवहार का नहीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और संविधान के सम्मान से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में इस प्रकरण को “उदाहरण” के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति अदालत की प्रतिष्ठा पर चोट करने की हिम्मत न करे।