डोनाल्ड ट्रम्प का बड़ा फैसला, ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत वैश्विक संस्थाओं से दूरी
वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका ने वैश्विक मंच पर एक बार फिर बड़ा और विवादास्पद कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से आधिकारिक रूप से बाहर निकल रहा है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार, इनमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संगठन और संयुक्त राष्ट्र की 31 संस्थाएं शामिल हैं। व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग का कहना है कि ये संगठन अमेरिकी हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, इनमें भारी धन की बर्बादी होती है और कई संस्थाएं या तो गैरजरूरी हैं या बेहद खराब तरीके से संचालित हो रही हैं।
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत बड़ा फैसला
ट्रम्प प्रशासन ने इस कदम को अपनी चर्चित ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का हिस्सा बताया है। इस नीति के तहत अमेरिका वैश्विक संस्थाओं और बहुपक्षीय समझौतों से दूरी बनाकर अपने घरेलू हितों और संप्रभुता को प्राथमिकता देता है। प्रशासन का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अमेरिका का योगदान अत्यधिक है, जबकि बदले में उसे अपेक्षित लाभ नहीं मिलते। इसी सोच के तहत यह फैसला लिया गया है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक कूटनीति पर गहरा असर डाल सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन से पहले ही अलग होने की घोषणा
इससे पहले ट्रम्प जनवरी 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकलने की घोषणा कर चुके हैं। नियमों के अनुसार, डब्ल्यूएचओ की सदस्यता छोड़ने के लिए एक साल का नोटिस पीरियड जरूरी होता है। इस प्रक्रिया के तहत 22 जनवरी के बाद अमेरिका औपचारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन का सदस्य नहीं रहेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस फैसले को वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए बड़ा झटका बताया था।
यूएन क्लाइमेट चेंज कन्वेंशन से भी अलग होगा अमेरिका
इस फैसले का सबसे अहम और दूरगामी प्रभाव अमेरिका का यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज से बाहर होना माना जा रहा है। यूएनएफसीसीसी वर्ष 1992 में अस्तित्व में आया एक वैश्विक समझौता है, जो लगभग पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक मंच पर लाता है। यही ढांचा आगे चलकर पेरिस जलवायु समझौते का आधार बना, जिससे ट्रम्प पहले ही अमेरिका को बाहर निकालने की बात कह चुके हैं। हाल ही में ब्राजील में हुई संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में अमेरिका ने अपना कोई प्रतिनिधिमंडल तक नहीं भेजा था।
प्रमुख जलवायु संस्थाओं से भी दूरी
यूएनएफसीसीसी के साथ-साथ अमेरिका इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज जैसी अहम वैज्ञानिक संस्था से भी अलग हो रहा है। यह संस्था जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक आकलन और रिपोर्ट तैयार करती है, जिनके आधार पर वैश्विक नीतियां बनती हैं। सेंटर फॉर बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी की जीन सू ने इसे गैरकानूनी और खतरनाक कदम बताते हुए कहा कि इससे अमेरिका हमेशा के लिए जलवायु कूटनीति से बाहर हो सकता है।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अमेरिका दूसरे स्थान पर
विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से वैश्विक जलवायु प्रयासों को गहरा झटका लगेगा। अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देश है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक रॉब जैक्सन जैसे विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के इस कदम से दूसरे देशों को भी अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को टालने या कमजोर करने का बहाना मिल सकता है। ट्रम्प लंबे समय से जलवायु परिवर्तन को ‘धोखा’ और ‘बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मुद्दा’ बताते रहे हैं।
ट्रम्प दशकों की मेहनत बर्बाद कर रहे: आलोचक
जो बाइडेन प्रशासन में पूर्व जलवायु सलाहकार जीना मैकार्थी ने ट्रम्प के फैसले की तीखी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अब अमेरिका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश होगा जो यूएनएफसीसीसी का हिस्सा नहीं रहेगा, जिससे दशकों की अमेरिकी जलवायु नेतृत्व और वैश्विक सहयोग की मेहनत बर्बाद हो जाएगी। उनके अनुसार, इससे अमेरिका ट्रिलियंस डॉलर के निवेश, नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता खो देगा, जो अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और महंगी प्राकृतिक आपदाओं से बचाने में सहायक होते।
चीन से प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ेगा असर
नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल के अध्यक्ष मनीष बापना ने इस फैसले को ‘बेवजह की गलती’ और ‘खुद को नुकसान पहुंचाने वाला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि इससे स्वच्छ ऊर्जा तकनीक के क्षेत्र में अमेरिका की चीन से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता कमजोर होगी। उनका तर्क है कि जब पूरी दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ रही है, तब ट्रम्प प्रशासन वैश्विक नेतृत्व छोड़कर अमेरिका को भविष्य के ट्रिलियंस डॉलर के निवेश से वंचित कर रहा है।
वैश्विक राजनीति में गहरे असर की आशंका
विश्लेषकों का मानना है कि 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने का यह फैसला केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी दूरगामी परिणाम लाएगा। इससे अमेरिका की वैश्विक छवि, नेतृत्व क्षमता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि अमेरिका के इस कदम के बाद बाकी देश वैश्विक संस्थाओं को कैसे मजबूत करते हैं और क्या अमेरिका भविष्य में अपनी नीति पर पुनर्विचार करता है।
/swadeshjyoti/media/agency_attachments/2025/11/09/2025-11-09t071157234z-logo-640-swadesh-jyoti-1-2025-11-09-12-41-56.png)
/swadeshjyoti/media/agency_attachments/2025/11/09/2025-11-09t071151025z-logo-640-swadesh-jyoti-1-2025-11-09-12-41-50.png)
/swadeshjyoti/media/media_files/2026/01/08/trump-2026-01-08-12-59-29.jpg)