आयात कर पर राष्ट्रपति का अधिकार नहीं: अदालत का स्पष्ट रुख, कंपनियां रिफंड के लिए कतार में

वॉशिंगटन। वॉशिंगटन में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे बड़े टैरिफ निर्णय को रद्द कर दिया है, जिससे प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपातकालीन कानून का उपयोग कर दुनिया भर के देशों पर आयात शुल्क लगाना संवैधानिक रूप से उचित नहीं था। संविधान के अनुसार आयात कर लगाने का अधिकार अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सरकार द्वारा पहले ही वसूले जा चुके लगभग 133 अरब डॉलर, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 11 लाख करोड़ रुपये के बराबर हैं, उनका क्या होगा। बड़ी कंपनियां अब अपने भुगतान की वापसी की मांग कर रही हैं और कई ने कानूनी कार्रवाई भी शुरू कर दी है।

रिफंड प्रक्रिया लंबी और जटिल

विशेषज्ञों के अनुसार रिफंड का अंतिम निर्णय अमेरिकी कस्टम विभाग, अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय और अन्य अदालतों की प्रक्रिया से होकर गुजरेगा। इसमें 12 से 18 महीने या उससे अधिक समय लग सकता है। कई आयातक कंपनियां पहले ही मुकदमे दायर कर चुकी हैं ताकि रिफंड की प्रक्रिया में उन्हें प्राथमिकता मिल सके।

हालांकि आम उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर राहत मिलने की संभावना कम बताई जा रही है। कारण यह है कि टैरिफ का बोझ कंपनियों ने वस्तुओं की बढ़ी कीमतों के रूप में ग्राहकों पर डाल दिया था। यह साबित करना कठिन होगा कि किस उपभोक्ता ने कितना अतिरिक्त भुगतान किया।

बड़ी कंपनियों ने दायर किए मुकदमे

कॉस्टको, रेव्लॉन और बम्बल बी फूड्स जैसी प्रमुख कंपनियां रिफंड के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा चुकी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में और भी कंपनियां दावा पेश कर सकती हैं। कुछ निर्माता यह भी तर्क दे सकते हैं कि कच्चे माल की कीमत बढ़ाने वाले आपूर्तिकर्ताओं की भी जवाबदेही तय हो।

इस मामले ने अमेरिकी व्यापार व्यवस्था में एक नई बहस को जन्म दिया है, जिसमें कार्यपालिका और विधायिका के अधिकारों की सीमा स्पष्ट रूप से सामने आई है।

कस्टम एजेंसी के नियम और ऐतिहासिक संदर्भ

अमेरिका की कस्टम एजेंसी के नियमों के अनुसार यदि आयातकों से गलती से अधिक शुल्क वसूला गया हो तो उसे वापस किया जा सकता है। व्यापार मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकार इसी मौजूदा प्रणाली का उपयोग कर रिफंड प्रक्रिया चला सकती है।

इतिहास में 1990 के दशक में भी अदालत ने निर्यात पर लगाए गए एक शुल्क को असंवैधानिक घोषित किया था और कंपनियों को रिफंड की व्यवस्था दी गई थी। लेकिन इस बार मामला कहीं अधिक व्यापक है, क्योंकि हजारों आयातकों और अरबों डॉलर की रकम एक साथ लौटानी पड़ सकती है।

अभूतपूर्व वित्तीय चुनौती

यदि अदालत के आदेश के अनुरूप पूरी राशि लौटानी पड़ी तो यह अमेरिकी प्रशासन के लिए एक बड़ी वित्तीय चुनौती होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए विशेष डिजिटल प्रणाली या अलग पोर्टल विकसित कर सकती है। हालांकि यह भी आशंका जताई जा रही है कि जिम्मेदारी कंपनियों पर डालते हुए उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालतों में दावा करना पड़ सकता है।

अदालत के इस फैसले ने न केवल व्यापार नीति बल्कि संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या पर भी व्यापक प्रभाव डाला है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि रिफंड की प्रक्रिया किस रूप में आगे बढ़ती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है।