राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का लगभग सफाया, सिर्फ एक उम्मीदवार की जीत; बड़े नेता चुनाव हारे
काठमांडू। नेपाल के संसदीय चुनाव में राजतंत्र की बहाली की मांग करने वाली राजनीतिक ताकतों को बड़ा झटका लगा है। चुनाव परिणामों में राजतंत्र समर्थक दल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला और पार्टी का लगभग पूरी तरह से सफाया हो गया। इस पार्टी से केवल एक उम्मीदवार ही जीत हासिल कर पाया, जबकि इसके अधिकांश प्रमुख नेता चुनाव में पराजित हो गए।
इन परिणामों के बाद नेपाल की राजनीति में राजतंत्र समर्थक दलों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव परिणाम संकेत देता है कि देश की बड़ी आबादी अब फिर से राजतंत्र की व्यवस्था की ओर लौटने के पक्ष में नहीं है।
राजतंत्र की बहाली का मुद्दा नहीं चला
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान देश में राजतंत्र की बहाली को प्रमुख मुद्दा बनाया था। पार्टी का मानना था कि नेपाल में अब भी बड़ी संख्या में लोग राजशाही व्यवस्था के प्रति समर्थन रखते हैं। हालांकि चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि यह मुद्दा मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल नहीं हो पाया।
चुनाव में पार्टी के केवल युवा नेता ज्ञानेन्द्र शाही ही जुमला संसदीय क्षेत्र से अपनी सीट बचाने में सफल रहे। इसके अलावा पार्टी से जुड़े लगभग सभी प्रमुख नेताओं को हार का सामना करना पड़ा।
कई बड़े नेताओं की हार
चुनाव में पार्टी के कई वरिष्ठ और चर्चित नेता पराजित हो गए। इनमें पूर्व अध्यक्ष और पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा, पूर्व पुलिस प्रमुख तथा दो बार सांसद और मंत्री रह चुके ध्रुव बहादुर प्रधान, लंबे समय तक बीबीसी नेपाली सेवा के प्रमुख रहे पत्रकार रवींद्र मिश्रा और कई बार मंत्री रह चुके दीपक बहादुर सिंह शामिल हैं।
पार्टी के अन्य पदाधिकारी और प्रमुख चेहरे भी चुनाव में सफलता हासिल नहीं कर सके। इससे स्पष्ट हो गया कि इस बार मतदाताओं ने राजतंत्र समर्थक राजनीति को व्यापक समर्थन नहीं दिया।
चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक इस्तीफा
चुनाव परिणाम सामने आने के तुरंत बाद पार्टी के उपाध्यक्ष रवींद्र मिश्रा ने पार्टी छोड़ने और सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। काठमांडू के एक संसदीय क्षेत्र से राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की उम्मीदवार रंजू दर्शाना से बड़े अंतर से हारने के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया।
मिश्रा ने कहा कि देश में कई लोगों के मन में राजशाही के प्रति भावनात्मक समर्थन जरूर है, लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व की कमजोरी, आपसी विवाद और स्वार्थपूर्ण राजनीति के कारण यह समर्थन वोट में परिवर्तित नहीं हो सका।
उन्होंने यह भी कहा कि अब वह सक्रिय राजनीति से दूर रहकर भी राजतंत्र के समर्थन में अपनी आवाज उठाते रहेंगे।
गणतांत्रिक व्यवस्था को मिला समर्थन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव के नतीजे नेपाल में स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता की स्वीकृति को भी दर्शाते हैं। नेपाल में वर्ष 2008 में राजतंत्र का औपचारिक अंत हुआ था और देश को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था।
तब से लेकर अब तक समय-समय पर कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों द्वारा राजतंत्र की बहाली की मांग उठाई जाती रही है, लेकिन चुनावी राजनीति में इस मुद्दे को व्यापक समर्थन नहीं मिल पाया।
पूर्व राजा की वापसी की संभावना कमजोर
चुनाव परिणामों के बाद अब पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह की सत्ता में वापसी की संभावना और कमजोर होती दिखाई दे रही है। हालांकि राजतंत्र समर्थक संगठनों द्वारा समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया जाता रहा है, लेकिन चुनावी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित ही रहा है।
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक पशुपति शमशेर राणा का कहना है कि जब तक राजतंत्र समर्थक दल व्यापक जनसमर्थन हासिल नहीं करते, तब तक नेपाल की व्यावहारिक राजनीति में राजतंत्र की वापसी का प्रश्न मजबूत नहीं बन पाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनाव परिणाम ने नेपाल की राजनीति को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि देश की जनता फिलहाल लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही आगे बढ़ाना चाहती है।
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