आतंकवाद पर शून्य सहिष्णुता, विकास और क्षमता निर्माण को मानवाधिकारों का आधार बताया
संयुक्त राष्ट्र। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मानवाधिकारों के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर समग्र और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर और वंचित वर्गों के दैनिक जीवन में ठोस और सकारात्मक बदलाव लाना होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में अपने वर्चुअल संदेश के माध्यम से संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया संघर्ष, ध्रुवीकरण और अनिश्चितता से घिरी हुई है। ऐसे समय में भारत साझा आधार खोजने और उसे मजबूत करने का प्रयास करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत टकराव के बजाय संवाद, विभाजन के बजाय सहमति और संकीर्ण हितों के बजाय मानव-केंद्रित विकास पर विश्वास करता है।
आतंकवादी कृत्यों के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की वकालत
जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद को मानवाधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरी तरह साकार करने के लिए आतंकवादी कृत्यों के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे जघन्य उल्लंघन है और निर्दोष लोगों को निशाना बनाने वाले कृत्यों का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि मानवाधिकारों की रक्षा को गंभीरता से लिया जाना है तो आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एकजुट और स्पष्ट रुख अपनाना अनिवार्य है। उनके अनुसार, दोहरे मानदंड और चयनात्मक दृष्टिकोण मानवाधिकारों की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।
मानवाधिकार परिषद में सातवीं बार भारत की सदस्यता
भारत हाल ही में सातवीं बार संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना गया है। संयुक्त महासभा में 188 में से 177 मत प्राप्त होना वैश्विक समुदाय के विश्वास को दर्शाता है। जयशंकर ने कहा कि यह समर्थन विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों के भरोसे को प्रतिबिंबित करता है।
उन्होंने कहा कि भारत मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए राजनीति, आरोप-प्रत्यारोप और दोहरे मानदंडों के बजाय संवाद, साझेदारी और क्षमता निर्माण के मार्ग को प्राथमिकता देता है। भारत का दृष्टिकोण सहयोग आधारित है, जिसमें विकास को मानवाधिकारों की जड़ माना गया है।
विकास और डिजिटल संरचना को बताया सशक्त माध्यम
जयशंकर ने भारत के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके माध्यम से करोड़ों लोगों को पारदर्शी और प्रभावी तरीके से कल्याणकारी योजनाओं, वित्तीय सेवाओं और सरकारी सुविधाओं तक पहुंच मिली है। उन्होंने कहा कि तकनीक और नवाचार को मानवाधिकारों की पहुंच बढ़ाने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि महामारी, जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक दबावों ने वैश्विक असमानताओं को और गहरा किया है। ऐसे में विकास को मानवाधिकारों का मूल आधार मानना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति भारत की प्रतिबद्धता
जयशंकर ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत समानता, गरिमा और सम्मान के आधार पर सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। भारत का अनुभव दर्शाता है कि समावेशी विकास, सामाजिक सुरक्षा और डिजिटल सशक्तिकरण के माध्यम से मानवाधिकारों को व्यवहारिक रूप से मजबूत किया जा सकता है।
उन्होंने वैश्विक समुदाय से आग्रह किया कि मानवाधिकारों को राजनीतिक उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय सरोकार के रूप में देखा जाए। केवल समग्र दृष्टिकोण और ठोस कार्यवाही से ही उन लोगों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है, जिनके लिए मानवाधिकार सबसे अधिक मायने रखते हैं।
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