अस्थायी रिहायश बनी काल, प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा पर फिर उठे गंभीर सवाल

अर्की। हिमाचल प्रदेश के अर्की क्षेत्र में सोमवार तड़के हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। नेपाल से करीब 970 किलोमीटर दूर अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हिमाचल आए दो प्रवासी परिवार रोजी-रोटी की तलाश में अर्की और आसपास के इलाकों में मजदूरी कर रहे थे। सीमित आय और मजबूरी के कारण उन्होंने कम लागत की अस्थायी रिहायश को ही अपना ठिकाना बनाया, लेकिन वही रिहायश उनके लिए मौत का कारण बन गई। आग ने कुछ ही पलों में उन सपनों को राख में बदल दिया, जिनके सहारे वे अपना घर-परिवार छोड़कर यहां आए थे।

तेजी से फैली आग, बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सोमवार तड़के अचानक लगी आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने तक का मौका नहीं मिला। लकड़ी और ज्वलनशील सामग्री से बनी अस्थायी झोपड़ियों में आग ने विकराल रूप ले लिया। दोनों परिवारों के सदस्य बच्चों को बचाने की कोशिश में जुट गए, लेकिन आग की लपटें इतनी भयावह थीं कि कोई भी बाहर नहीं निकल सका। आसपास मौजूद लोग चाहकर भी उनकी मदद नहीं कर पाए। कुछ ही मिनटों में सब कुछ जलकर खाक हो गया।

नेपाल से आए थे बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर

जानकारी के अनुसार नेपाल के सल्यान जिले के निवासी कांशी राम अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ यहां रह रहे थे। वहीं धन बहादुर अपनी पत्नी, दो बेटियों और एक बेटे के साथ उसी अस्थायी बस्ती में जीवन यापन कर रहे थे। दोनों परिवार मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह अपना गुजारा चला रहे थे। आग की इस घटना में सभी लोग चपेट में आ गए। अब तक तीन शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि अन्य की तलाश और पहचान की प्रक्रिया जारी है। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उन प्रवासी मजदूरों की त्रासदी को उजागर करता है, जो मजबूरी में असुरक्षित हालात में रहने को विवश हैं।

पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं

यह पहली बार नहीं है जब जिला सोलन में प्रवासी मजदूरों की अस्थायी बस्तियों में आग ने जानलेवा रूप लिया हो। इससे पहले झाड़माजरी क्षेत्र में भी एक भीषण अग्निकांड में 10 प्रवासी मजदूर जिंदा जल गए थे। उस घटना के बाद भी सुरक्षा मानकों, अस्थायी रिहायश और अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात ज्यादा नहीं बदले। अर्की की यह घटना बताती है कि पिछली त्रासदियों से कोई ठोस सबक नहीं लिया गया।

अस्थायी बस्तियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रवासी मजदूर हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। निर्माण कार्य, उद्योग, कृषि और अन्य क्षेत्रों में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी सुरक्षा और जीवन स्थितियों को लेकर प्रशासन की संवेदनशीलता बार-बार सवालों के घेरे में आती है। हर अग्निकांड के बाद जांच और मुआवजे की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नजर नहीं आते। अस्थायी बस्तियों में न तो अग्नि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं और न ही रहने के सुरक्षित विकल्प।

फायर सुरक्षा की कमी भी बनी बड़ी वजह

अर्की उपमंडल में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था भी इस हादसे में एक बड़ा सवाल बनकर सामने आई है। मानकों के अनुसार यहां अग्निशमन विभाग का उपमंडल होना चाहिए, लेकिन फिलहाल केवल एक अग्निशमन चौकी के भरोसे ही व्यवस्था चल रही है। यहां अग्निशमन से बचाव की सुविधाएं बेहद सीमित हैं। कई बार अग्निशमन वाहनों को करीब 20 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है, जिससे आग पर समय रहते काबू पाना मुश्किल हो जाता है। इसी कारण इस हादसे के दौरान बद्दी, शिमला और दाड़लाघाट से अग्निशमन वाहनों को बुलाना पड़ा।

टास्क फोर्स बनी, लेकिन नतीजे नहीं दिखे

झाड़माजरी हादसे के बाद ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण के लिए टास्क फोर्स गठित कर चर्चा तो जरूर हुई थी, लेकिन उसके प्रयास अब तक धरातल पर नजर नहीं आते। यदि समय रहते अस्थायी बस्तियों की सुरक्षा, अग्नि मानकों और फायर सेवाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी दर्दनाक घटनाएं भविष्य में भी दोहराई जाती रहेंगी। अर्की का यह अग्निकांड केवल दो परिवारों की त्रासदी नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों प्रवासी मजदूरों की कहानी है, जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने घर-परिवार से दूर आकर असुरक्षित हालात में जीवन बिताने को मजबूर हैं।