वॉशिंगटन के दावों पर तेहरान की तीखी प्रतिक्रिया, क्षेत्रीय तनाव और बढ़ा 

तेहरान। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अमेरिका ने इस्राइल के पक्ष में अपनी इच्छा से युद्ध का रास्ता चुना है। अराघची ने स्पष्ट किया कि तथाकथित ‘ईरानी खतरे’ जैसा कोई वास्तविक आधार नहीं था और यह संघर्ष वॉशिंगटन की नीति का परिणाम है।

मार्को रुबियो ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका को पहले से जानकारी थी कि उसका सहयोगी इस्राइल कार्रवाई करने वाला है। उन्होंने यह भी दावा किया कि आशंका थी कि तेहरान क्षेत्र में तैनात अमेरिकी बलों पर जवाबी हमला हो सकता है। रुबियो के अनुसार, यदि पहले कदम नहीं उठाया जाता तो अधिक हताहत हो सकते थे।

अराघची का बयान: ‘कोई ईरानी खतरा नहीं था’

रुबियो के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए अराघची ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि अमेरिकी विदेश मंत्री ने वही स्वीकार किया है जो सब जानते थे—अमेरिका ने इस्राइल के समर्थन में युद्ध का विकल्प चुना। उन्होंने कहा कि ईरान से जुड़ा कोई तथाकथित खतरा कभी मौजूद नहीं था।

अराघची ने आरोप लगाया कि अमेरिकी और ईरानी दोनों का खून इस्राइल समर्थक विचारधारा के कारण बहा है। उन्होंने अमेरिकी जनता से अपील करते हुए कहा कि वे इस नीति पर पुनर्विचार करें और अपने देश की दिशा को बदलें।

अमेरिकी रक्षा सचिव का पक्ष

इससे पहले अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा था कि तेहरान में हुआ हमला इस्राइल द्वारा अंजाम दिया गया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की मौत हुई। खुफिया जानकारी के अनुसार, उस समय वे एक बैठक में मौजूद थे।

रुबियो ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन का मानना था कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई आवश्यक थी। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ईरानी सरकार का अंत इस अभियान का घोषित उद्देश्य नहीं था, लेकिन ऑपरेशन को अनिवार्य बताया गया।

बढ़ता क्षेत्रीय तनाव

इन बयानों के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और गहरा गया है। एक ओर अमेरिका और इस्राइल अपने कदम को सुरक्षा हितों से जोड़ रहे हैं, वहीं ईरान इसे आक्रामक और अनुचित हस्तक्षेप करार दे रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सार्वजनिक रूप से इस तरह के तीखे आरोप-प्रत्यारोप क्षेत्रीय कूटनीति को और कठिन बना सकते हैं। फिलहाल दोनों पक्षों के रुख में नरमी के संकेत कम दिखाई दे रहे हैं। मौजूदा हालात में वैश्विक समुदाय की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीतिक प्रयास इस टकराव को कम कर पाएंगे या क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और तेज होंगी।