आज के समय में बहुत से लोग यह शिकायत करते हैं कि उन्हें बार-बार कुछ न कुछ खाने की इच्छा होती रहती है, भले ही उनका पेट पूरी तरह भरा हुआ हो। यह स्थिति सामान्य भूख से अलग होती है। इसमें असल में शरीर भोजन नहीं मांग रहा होता, बल्कि दिमाग के भीतर एक लगातार चलने वाली आवाज व्यक्ति को खाने के बारे में सोचने पर मजबूर करती रहती है। यही स्थिति भोजन से संबंधित शोर विकार कहलाती है।
यह कोई साधारण आदत या कमजोरी नहीं, बल्कि एक मानसिक और व्यवहारिक समस्या है। इसमें व्यक्ति का ध्यान बार-बार भोजन की ओर चला जाता है। काम करते समय, आराम करते हुए, टीवी देखते हुए या सोने से ठीक पहले भी खाने के विचार मन में आते रहते हैं। धीरे-धीरे यह स्थिति व्यक्ति की जीवनशैली, वजन, आत्मनियंत्रण और मानसिक संतुलन को प्रभावित करने लगती है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं रहता।
यह समस्या क्यों बढ़ रही है?
आज की आधुनिक जीवनशैली इस विकार को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है। लगातार मोबाइल फोन देखना, सोशल मीडिया पर खाने से जुड़े वीडियो, हर समय दिखने वाले भोजन के विज्ञापन और अनियमित दिनचर्या दिमाग को भोजन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देते हैं। ऐसे में शरीर की वास्तविक भूख और मानसिक लालसा के बीच का फर्क धीरे-धीरे खत्म होने लगता है।
जब व्यक्ति तनाव, अकेलापन, ऊब या थकान महसूस करता है, तो दिमाग तुरंत भोजन को राहत के साधन के रूप में देखने लगता है। शुरुआत में यह थोड़ी देर की खुशी देता है, लेकिन धीरे-धीरे यह आदत बन जाती है और फिर शोर विकार का रूप ले लेती है। व्यक्ति बिना समझे इस चक्र में फंसता चला जाता है।
भोजन की लालसा और वास्तविक भूख में अंतर
वास्तविक भूख शरीर से आती है और धीरे-धीरे बढ़ती है। इसमें साधारण भोजन भी संतोष दे देता है और खाने के बाद तृप्ति महसूस होती है। यह शरीर की प्राकृतिक जरूरत होती है।
इसके विपरीत भोजन की लालसा अचानक होती है और आमतौर पर तले-भुने, मीठे या ज्यादा मसालेदार खाने की ओर झुकाव पैदा करती है। इस विकार में व्यक्ति जानता है कि उसे असल में भूख नहीं है, फिर भी खाने का मन शांत नहीं होता। यही अंतर समझना इस समस्या को नियंत्रित करने की दिशा में सबसे पहला और जरूरी कदम माना जाता है।
भोजन शोर विकार के लक्षण
इस समस्या के संकेत धीरे-धीरे सामने आते हैं, इसलिए कई लोग शुरुआत में इन्हें पहचान नहीं पाते। व्यक्ति दिन में कई बार खाने के बारे में सोचता रहता है, बिना भूख के भी कुछ न कुछ खा लेता है और खाने के बाद अपराधबोध महसूस करता है।
समय के साथ वजन बढ़ने लगता है, आत्मनियंत्रण कमजोर पड़ जाता है और व्यक्ति खुद से नाराज रहने लगता है। कई बार यह आदत नींद, काम की एकाग्रता और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करने लगती है, जिससे व्यक्ति अंदर ही अंदर परेशान रहने लगता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर
लगातार खाने के विचार दिमाग को मानसिक रूप से थका देते हैं। व्यक्ति खुद को कमजोर, असफल और नियंत्रण खोता हुआ महसूस करने लगता है। इससे आत्मविश्वास कम होता है और तनाव बढ़ता जाता है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो आगे चलकर चिंता, बेचैनी और अवसाद जैसी समस्याएं भी जन्म ले सकती हैं। यही कारण है कि इसे केवल खान-पान की समस्या नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन से जुड़ा गंभीर विषय समझना बेहद जरूरी है।
लालसा को नियंत्रित कैसे करें?
भोजन की लालसा पर नियंत्रण संभव है, लेकिन इसके लिए धैर्य, जागरूकता और सही रणनीति की जरूरत होती है। सबसे पहले नियमित समय पर भोजन करने की आदत डालनी चाहिए। जब शरीर को सही समय पर पोषण मिलता है, तो दिमाग अनावश्यक संकेत भेजना धीरे-धीरे कम कर देता है।
भोजन को ध्यानपूर्वक और शांति से खाने की आदत भी बहुत मददगार होती है। जल्दबाजी में या मोबाइल देखते हुए खाने से संतुष्टि नहीं मिलती, जिससे लालसा बनी रहती है और बार-बार खाने का मन करता है।
भावनात्मक खाने से कैसे बचें?
जब भी अचानक खाने का मन करे, तो खुद से यह सवाल जरूर पूछें कि यह सच में भूख है या कोई भावना। अगर मन भारी है, तनाव महसूस हो रहा है या अकेलापन है, तो टहलना, गहरी सांस लेना, संगीत सुनना या किसी अपने से बात करना ज्यादा बेहतर विकल्प हो सकता है।
भावनाओं को भोजन से नहीं, बल्कि समझदारी और स्वस्थ तरीकों से संभालना इस विकार से बाहर निकलने में सबसे ज्यादा मदद करता है।
दिनचर्या और नींद की भूमिका
अनियमित नींद और लगातार थका हुआ शरीर भोजन की लालसा को और बढ़ा देता है। जब नींद पूरी नहीं होती, तो शरीर के हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, जिससे खाने की इच्छा बढ़ जाती है।
पर्याप्त नींद लेना और सुबह उठने, खाने तथा सोने का समय तय करने से दिमाग को स्थिरता मिलती है। इससे लालसा धीरे-धीरे कम होने लगती है और आत्मनियंत्रण मजबूत होता है।
कब विशेषज्ञ की मदद जरूरी है?
अगर भोजन के विचार जीवन पर हावी होने लगें, वजन तेजी से बढ़ने लगे या मानसिक परेशानी बढ़ जाए, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो जाता है। समय पर सही मार्गदर्शन मिलने से स्थिति बिगड़ने से रोकी जा सकती है।
विशेषज्ञ की मदद कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी का संकेत मानी जानी चाहिए।
निष्कर्ष
भोजन से संबंधित शोर विकार एक वास्तविक और गंभीर समस्या है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह केवल खाने की आदत नहीं, बल्कि दिमाग, भावनाओं और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा विषय है। सही समझ, नियमित दिनचर्या, भावनात्मक संतुलन और आत्मनियंत्रण से इस लालसा को काबू में किया जा सकता है। जागरूकता और धैर्य ही इसका सबसे मजबूत समाधान है।
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