August 29, 2025 10:37 PM

गौतम गंभीर के खिलाफ मामले में फैसला सुरक्षित, दवाई और ऑक्सीजन के अवैध भंडारण पर गहराई से होगी सुनवाई

gautam-gambhir-case-delhi-hc-verdict-reserved

गौतम गंभीर मामले में फैसला सुरक्षित: दवाई और ऑक्सीजन के अवैध भंडारण पर अदालत का रुख अहम

नई दिल्ली। कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान दवाईयों और ऑक्सीजन की किल्लत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस कठिन दौर में नेताओं, संगठनों और समाजसेवियों पर राहत पहुंचाने के नाम पर दवाईयों और ऑक्सीजन के अवैध भंडारण के आरोप लगे। इन्हीं मामलों में पूर्व भाजपा सांसद और वर्तमान में भारतीय क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर भी आरोपितों में शामिल हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायाधीश नीना बंसल कृष्णा ने इस मामले पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

अदालत में क्या मामला है

गौतम गंभीर और उनके ट्रस्ट गौतम गंभीर फाउंडेशन पर आरोप है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उन्होंने बड़ी मात्रा में कोरोना रोधी दवाईयों को अपने पास जमा किया और मेडिकल कैंप लगाकर उनका वितरण किया। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के प्रावधानों के अनुसार, बिना अनुमति और पंजीकरण के इस तरह का भंडारण या वितरण गैरकानूनी है। इसी आधार पर दिल्ली सरकार के ड्रग कंट्रोलर ने 8 जुलाई 2021 को गंभीर और उनके सहयोगियों के खिलाफ अभियोजन शुरू किया था।

दर्ज एफआईआर और शामिल नाम

ड्रग कंट्रोलर ने गौतम गंभीर के अलावा उनकी पत्नी सीमा गंभीर, नताशा गंभीर, फाउंडेशन की सीईओ अपराजिता सिंह समेत अन्य जिम्मेदार लोगों पर ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 18(सी) और 27(बी) के तहत मामला दर्ज कराया। इन धाराओं के तहत बिना लाइसेंस दवाईयों का भंडारण और बिक्री अपराध की श्रेणी में आता है।

वकील की दलीलें

गौतम गंभीर की ओर से उनके वकील अनंत देहादराय ने अदालत में एफआईआर निरस्त करने की मांग रखी। उनका कहना था कि गंभीर और उनकी संस्था ने लोगों की मदद के लिए दवाइयां जुटाईं और उन्हें निशुल्क वितरित किया। ऐसे में इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

अन्य नेताओं पर भी मुकदमा

सिर्फ गौतम गंभीर ही नहीं, बल्कि इस मामले में आम आदमी पार्टी के विधायक प्रवीण कुमार और इमरान हुसैन पर भी आरोप लगे। आरोप है कि इमरान हुसैन ने हरियाणा ड्रग कंट्रोल विभाग से अनाधिकृत रूप से मेडिकल ऑक्सीजन हासिल की और उसका वितरण किया। इसी तरह प्रवीण कुमार पर भी दवाईयों के अवैध भंडारण का आरोप है। तीनों नेताओं के खिलाफ जांच पूरी होने के बाद अभियोजन की कार्रवाई शुरू की गई थी।

अदालत का रुख

दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान सभी पक्षों की दलीलें सुनीं और अब इस पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह फैसला आने वाले दिनों में न केवल नेताओं के लिए बल्कि समाज में जिम्मेदारी और जवाबदेही की बहस को भी प्रभावित करेगा। अदालत को यह तय करना है कि महामारी जैसी आपात स्थिति में राहत पहुंचाने के नाम पर किए गए ऐसे कदम कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में आते हैं या नहीं।

पृष्ठभूमि: क्यों है यह मामला अहम

साल 2021 की दूसरी लहर में देशभर में ऑक्सीजन सिलेंडर और दवाइयों की भारी कमी हो गई थी। अस्पतालों में मरीजों की जान बचाना मुश्किल हो गया था। इस दौर में राजनीतिक दलों के नेताओं और एनजीओ पर यह आरोप बार-बार लगे कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बड़ी मात्रा में जीवन रक्षक दवाईयों और ऑक्सीजन को जमा किया, जिससे आम जनता तक इसकी आपूर्ति बाधित हुई। अदालत में यह मामला इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तय करेगा कि राहत कार्य और अवैध जमाखोरी में अंतर की कानूनी परिभाषा क्या होगी।

अगली सुनवाई और संभावित असर

हालांकि फैसला अभी सुरक्षित रखा गया है, लेकिन इसके नतीजे का असर न केवल इन नेताओं की राजनीतिक साख पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य में किसी भी आपदा प्रबंधन के दौरान राहत सामग्री के वितरण के तरीके और नियम-कानून पर भी व्यापक असर देखने को मिलेगा। यदि अदालत आरोपों को सही मानती है तो यह नेताओं और संगठनों के लिए चेतावनी होगी कि मदद के नाम पर भी कानून को ताक पर नहीं रखा जा सकता।


Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on whatsapp
Share on telegram