publive-image
 प्रो. संजय द्विवेदी

समय के साथ मीडिया की भूमिका और स्वरूप में परिवर्तन आया है

पत्रकारिता विश्व के सबसे प्राचीन और प्रभावशाली पेशों में से एक है। जब किसी समाज को तीव्र परिवर्तन की आवश्यकता होती है, तब पत्रकारिता से अधिक प्रभावी माध्यम शायद ही कोई दूसरा हो। भारत उन चुनिंदा देशों में है जहां संचार और अभिव्यक्ति की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त लिपि के प्रमाण बताते हैं कि यहाँ चार हजार वर्ष पूर्व ही विचारों के आदान-प्रदान की विकसित प्रणाली मौजूद थी। यही परंपरा आगे चलकर आधुनिक पत्रकारिता के रूप में विकसित हुई।

हिंदी के प्रथम समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड का ध्येय वाक्य था, ‘हिंदुस्तानियों के हित का हेत।’ इस वाक्य में भारतीय पत्रकारिता का मूल मूल्य निहित है- जनहित। पत्रकारिता का उद्देश्य सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि समाज के हितों की रक्षा और लोकचेतना का संवर्धन है। भारतीय पत्रकारिता ने अपनी दीर्घ यात्रा में यह सिद्ध किया है कि वह लोकतंत्र का सशक्त चौथा स्तंभ है।

भारत में आधुनिक पत्रकारिता की औपचारिक शुरुआत 1780 में हुई, जब जेम्स अगस्टस हिकी ने कोलकाता से ‘बंगाल गजट’ का प्रकाशन किया। इसका आदर्श वाक्य था,‘सभी के लिए खुला, पर किसी से प्रभावित नहीं।’ हिक्की ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष किया और यह स्थापित किया कि पत्रकारिता का आधार निर्भीकता और आत्मस्वातंत्र्य है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता जनजागरण का प्रमुख साधन बनी। समाचार पत्रों ने सामाजिक चेतना को जागृत किया, औपनिवेशिक शासन की नीतियों की आलोचना की और राष्ट्रीय अस्मिता को बल दिया। उस दौर में पत्रकारिता मिशन थी, राष्ट्रनिर्माण का संकल्प थी। मीडिया ने सरकार और जनता के बीच संवाद सेतु का कार्य किया और सत्ता की जवाबदेही सुनिश्चित की। यही कारण है कि आज भी समाज मीडिया की ओर आशा और विश्वास से देखता है।

समय के साथ मीडिया की भूमिका और स्वरूप में परिवर्तन आया है। संचार क्रांति ने पत्रकारिता को नई गति दी है। तकनीक ने सूचना के प्रवाह को तीव्र और व्यापक बनाया है, किंतु इसके साथ विश्वसनीयता की चुनौती भी बढ़ी है। लोकतंत्र में विचारों की विविधता, मतभेद और असहमति का सम्मान आवश्यक है। मीडिया विभिन्न पक्षों को सामने लाकर समाज को विचार-मंथन का अवसर देता है। वह केवल घटनाओं का दर्पण नहीं, बल्कि समाज की दिशा निर्धारित करने वाला माध्यम भी है।

21वीं शताब्दी को इंटरनेट और सोशल मीडिया का युग कहा जा रहा है। डिजिटल मीडिया ने संप्रेषण की प्रकृति ही बदल दी है। आज इंटरनेट और स्मार्टफोन ने दुनिया को एक वैश्विक गांव में परिवर्तित कर दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक व्हाट्सएप और ट्विटर ने संवाद की गति और दायरा दोनों को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है।

अब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं एक प्रकाशक है।

‘हूटसूट’ और ‘वी आर सोशल’ की रिपोर्टों के अनुसार विश्व में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या अरबों में पहुंच चुकी है और प्रतिदिन लाखों नए उपयोगकर्ता जुड़ रहे हैं। औसतन एक व्यक्ति प्रतिदिन दो घंटे से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताता है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि डिजिटल मंच आज जनमत निर्माण का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुके हैं।

भारत इंटरनेट और स्मार्टफोन के बड़े बाजार के रूप में उभरा है। डिजिटल पहुंच ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया है, परंतु इसके साथ ‘फेक न्यूज’ और ‘पोस्ट ट्रुथ’ जैसी चुनौतियां भी सामने आई हैं। माइक्रोसॉफ्ट की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भारत में बड़ी संख्या में इंटरनेट उपयोगकर्ता फर्जी खबरों का सामना करते हैं। समस्या केवल तकनीकी नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक भी है। जब तथ्य से अधिक भावनाएं प्रभावी हो जाती हैं और सत्य-असत्य का भेद धुंधला पड़ जाता है, तब ‘पोस्ट ट्रुथ’ की स्थिति उत्पन्न होती है।

पहले समाचारों का प्रवाह संस्थागत और नियंत्रित प्रक्रिया से होता था। संपादकीय मानदंड और कानूनी उत्तरदायित्व स्पष्ट थे। किंतु आज तकनीक ने सूचना के स्रोत असंख्य बना दिए हैं। इससे अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण तो हुआ है, पर जिम्मेदारी का संकट भी गहराया है। हर व्यक्ति अपनी बात कह सकता है, पर हर व्यक्ति तथ्यपरक और उत्तरदायी हो, यह आवश्यक नहीं। परिणामस्वरूप आम नागरिक के सामने सत्य और असत्य के बीच चयन की चुनौती बढ़ गई है।

ऐसे समय में मीडिया साक्षरता अत्यंत आवश्यक है। बचपन से ही शिक्षा प्रणाली में ऐसे पाठ्यक्रम शामिल किए जाने चाहिए जो विद्यार्थियों को तथ्य और मत, सूचना और प्रोपेगेंडा, सत्य और कल्पना के बीच अंतर करना सिखाएं। तकनीकी दक्षता के साथ बौद्धिक विवेक का विकास भी अनिवार्य है। समाज को ऐसे उपकरण और दृष्टि चाहिए, जिससे वह सूचनाओं का विश्लेषण कर सके और भ्रम से बच सके।

पत्रकारिता का मूल दायित्व लोक शिक्षण है। यह केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज का बौद्धिक प्रबोधन करना है। पत्रकारिता आत्मशिक्षण से ही लोकशिक्षण की ओर बढ़ती है। उसे राष्ट्र की दृष्टि और बौद्धिक चेतना को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए। आज जब भारत वैश्विक मंच पर नई ऊर्जा के साथ उभर रहा है, तब मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत की विविधता उसकी शक्ति है। भाषा, संस्कृति, परंपरा और विचारों की बहुलता के बीच एकात्म भाव जगाना मीडिया का दायित्व है। संकट के समय भारतीय समाज शीघ्र एकजुट हो जाता है, पर सामान्य परिस्थितियों में वह एकता शिथिल हो जाती है। पत्रकारिता को इस एकात्म चेतना को स्थायी भाव में स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए।

स्वतंत्रता आंदोलन के समय पत्रकारिता त्याग और समर्पण का पर्याय थी। आज स्वतंत्र भारत में भी सकारात्मक, प्रेरणादायी और राष्ट्रनिर्माण को बल देने वाली पत्रकारिता की आवश्यकता है। जैसे स्वराज के लिए ऊर्जा थी, वैसे ही सुराज्य के लिए भी संकल्प होना चाहिए। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और खेल के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को विश्वपटल पर प्रतिष्ठित करना भी मीडिया की जिम्मेदारी है।

भारतीय मीडिया को वैश्विक पहुंच और विश्वसनीयता अर्जित करनी होगी। उसे तथ्यपरकता, संतुलन और नैतिकता के उच्च मानकों को अपनाना होगा। लोकतंत्र की सार्थकता जनसहभागिता से होती है, और यह सहभागिता जागरूक नागरिकों से संभव है। मीडिया यदि अपने पाठकों और दर्शकों को बौद्धिक रूप से समृद्ध बनाता है, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करता है।

अंततः, पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। यह समाज के विवेक की आवाज है। डिजिटल युग की चुनौतियों के बीच भी यदि पत्रकारिता अपने मूल मूल्यों- सत्य, जनहित और नैतिक साहस को बनाए रखे, तो वह न केवल लोकतंत्र की रक्षा करेगी, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभाएगी।      

 (लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

expert opinions:     

बेटियों की सुरक्षा का प्रश्न और समाज की सामूहिक चेतना -कैलाश चंद्र वरिष्ठ स्तंभकार

शुरुआती कारोबार में शेयर बाजार पर दबाव, सेंसेक्स और निफ्टी लुढ़के

परिवहन नीति के विरोध में 2 मार्च से बस ऑपरेटरों की हड़ताल की चेतावनी परमिट और डीजल की बढ़ती कीमतों का विरोध

क्या टमाटर का रस सच में दोबारा उगा सकता है बाल? जानें पूरी सच्चाई