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expert opinions:- राजनीति में शब्द कभी-कभी नीतियों से ज़्यादा ख़तरनाक हो जाते हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा भाजपा के केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार दोस्त’ कहे जाने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाता है, क्या भारत की राजनीति अब विचारधारा से नहीं, लेबल से चलेगी? अगर किसी नेता का कांग्रेस छोड़ना ही उसे गद्दार बना देता है, तो फिर कांग्रेस का इतिहास खुद कटघरे में खड़ा नज़र आता है।कांग्रेस छोड़ने वालों की लंबी कतार है, रवनीत सिंह बिट्टू अकेले नहीं हैं।उनमे कुछ चर्चिच नामों में एक हैं ममता बनर्जी जिन्होंने कांग्रेस से निकलकर तृणमूल कांग्रेस बनाई, आज कांग्रेस की सबसे आक्रामक विरोधी हैं। एनसीपी के शरद पवार जिन्होंने कांग्रेस तोड़ी, एनसीपी बनाई, सत्ता समीकरण बदल दिए। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जो कभी राहुल गांधी के करीबी हुआ करते थे पर आज भाजपा के सबसे प्रभावी मुख्यमंत्रियों में से एक माने जाते हैं। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जिन्होंने कांग्रेस में अपनी बेकदरी के चलते पार्टी छोड़ी थी, आज भाजपा में विश्वस्त केंद्रीय मंत्री हैं। जी.के. वासन, एस.एम. कृष्णा, जयवर्धन यादव, अनिल शर्मा, ललितेशपति त्रिपाठी- सूची लंबी है, पर सवाल वही है- क्या ये सब भी ‘गद्दार दोस्त’ थे? या गद्दारी का प्रमाणपत्र केवल भाजपा में जाने पर ही जारी होता है?
गद्दार भी और वापस बुलाने का न्योता भी?
इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी पहलू यह है कि राहुल गांधी ने बिट्टू को ‘गद्दार दोस्त’ कहने के साथ-साथ यह भी कहा कि-“तुम वापस कांग्रेस में ही आओगे।”यहाँ राजनीति खुद अपने तर्क से टकरा जाती है। अगर कोई नेता गद्दार है, तो उसे वापस बुलाने का नैतिक आधार क्या है? क्या गद्दारी स्थायी नहीं, परिस्थितिजन्य होती है? या फिर गद्दार सिर्फ तब तक है, जब तक वह विपक्ष में है? यह सवाल कांग्रेस की नैतिक राजनीति के दावे पर सीधा प्रहार करता है।
जब भाजपा से कांग्रेस आना ‘प्रायश्चित’ होता है
दिलचस्प यह भी है कि जो नेता भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आता है, वह गद्दार नहीं कहलाता, बल्कि उसे वैचारिक जागरण, घर वापसी और लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक बना दिया जाता है। नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा छोड़कर कांग्रेस आए तो वे गद्दार नहीं हुए, टॉम वडक्कन आए तो स्वागत हुआ, हार्दिक पटेल गए तो वे अवसरवादी कहलाए यानि गद्दारी की परिभाषा पार्टी कार्यालय की चौखट पर बदल जाती है।
असल समस्या : वैचारिक शून्यता
‘गद्दार दोस्त’ जैसे शब्दों की राजनीति दरअसल एक गहरी असहजता को उजागर करती है जैसे विचारों की कमी, विकल्प की कमी और भरोसे की कमी। जब विपक्ष के पास ठोस वैकल्पिक राजनीति नहीं होती, तब वह व्यक्तियों पर हमला करता है।जब बहस नीतियों पर नहीं हो पाती, तब भाषा तीखी कर दी जाती है।लेकिन मतदाता शब्दों से नहीं, परिणामों से फैसला करता है। लोकतंत्र में आख़िरी फैसला जनता का होता है। किसी नेता को गद्दार या देशभक्त घोषित करने का अधिकार किसी पार्टी के पास नहीं है। यह अधिकार केवल जनता के पास है वह भी ईवीएम के ज़रिये।अगर दल बदलने वाला नेता जनता का विश्वास जीत ले, तो तमाम लेबल बेमानी हो जाते हैं। और अंत में यही सवाल बचता है-अगर ‘गद्दार दोस्त’ को भी वापस कांग्रेस में लौटने का आमंत्रण दिया सकता है, तो गद्दारी आखिर है क्या-सिद्धांत या सुविधा?
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