आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने पर सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई, अमीर हो चुके लाभार्थियों को बाहर करने की मांग
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक बेहद संवेदनशील और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुनवाई शुरू की, जो सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के स्वरूप को लेकर है। सवाल यह है कि क्या उन लोगों को भी आरक्षण का लाभ जारी रहना चाहिए, जो पहले से ही इस व्यवस्था का फायदा उठाकर आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत स्थिति में पहुंच चुके हैं, या फिर आरक्षण का लाभ उन गरीब और अत्यधिक पिछड़े वर्गों तक सीमित होना चाहिए, जो आज भी अपनी जाति में सबसे निचले पायदान पर हैं।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब एक अनुसूचित जाति (एससी) और एक अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के व्यक्ति ने मिलकर सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में कई बार वही अमीर और सक्षम परिवार बार-बार लाभ उठा लेते हैं, जो पहले ही सरकारी नौकरी, अच्छी शिक्षा और जीवन की बेहतर सुविधाएं हासिल कर चुके हैं। इससे असली जरूरतमंद और गरीब लोगों तक यह लाभ नहीं पहुंच पाता।
न्यायालय की प्रारंभिक टिप्पणी
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय में ऐसे कई लोग हैं, जो अब अच्छी नौकरियों, मकानों और शिक्षा सुविधाओं से संपन्न हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या उन्हें अभी भी उसी तरह आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए, जबकि उनकी ही जाति के अन्य लोग गरीबी और पिछड़ेपन से जूझ रहे हैं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर निर्णय लेते समय बेहद सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि यह मुद्दा सामाजिक संरचना और संवैधानिक प्रावधानों से गहराई से जुड़ा है।

आरक्षण में सब-कैटेगरी की पृष्ठभूमि
यह बहस नई नहीं है। 1 अगस्त 2024 को सर्वोच्च न्यायालय की सात जजों की बेंच (जिसका फैसला जस्टिस बीआर गवई ने लिखा था) ने राज्यों को अनुमति दी थी कि वे एससी समुदाय के भीतर भी उप-वर्गीकरण (सब-कैटेगरी) कर सकते हैं, ताकि आरक्षण का बड़ा हिस्सा वास्तव में सबसे ज्यादा वंचित समूहों तक पहुंचे। इस फैसले का उद्देश्य था कि जो जातियां या समूह सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व रखते हैं, उन्हें प्राथमिकता मिले।
पहले भी उठ चुकी है क्रीमी लेयर की मांग
याचिकाकर्ताओं ने दलित समुदाय में भी क्रीमी लेयर लागू करने की मांग रखी है, जैसा कि ओबीसी में पहले से लागू है। हालांकि, इस तरह की मांग पहले भी कई बार उठी, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत आरक्षण को आर्थिक के बजाय सामाजिक आधार पर दिए जाने की वजह से इसे हमेशा खारिज किया गया। दलित और आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षण का आधार ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और वंचना रही है, न कि केवल आर्थिक स्थिति, क्योंकि उनके साथ होने वाला भेदभाव जातिगत पहचान के कारण गहरा और स्थायी है।
न्यायिक फैसलों का क्रम
- 1992 – सर्वोच्च न्यायालय ने ओबीसी में क्रीमी लेयर लागू करने का आदेश दिया, लेकिन एससी-एसटी को इससे बाहर रखा। कारण यह दिया गया कि उनकी वंचना का कारण सामाजिक भेदभाव है, आर्थिक स्थिति नहीं।
- 2006 – एससी-एसटी को पदोन्नति में भी आरक्षण देने की अनुमति दी गई और क्रीमी लेयर लागू करने की मांग खारिज कर दी गई।
- 2018 – पदोन्नति में आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने का संकेत दिया, ताकि जो लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत हो चुके हैं, उन्हें लाभ से बाहर किया जा सके।
- 2020 – आदिवासी समाज के लिए 100% आरक्षण को असंवैधानिक बताया गया, लेकिन क्रीमी लेयर पर सीधी टिप्पणी नहीं की गई।
- 2022 – एससी-एसटी उप-वर्गीकरण का रास्ता साफ किया और आर्थिक आधार पर आंतरिक विभाजन का संकेत दिया।
- 2024 – सात जजों की बेंच ने एससी समुदाय के भीतर सब-कैटेगरी बनाने की अनुमति दी।
बहस के केंद्र में सामाजिक न्याय
यह पूरा मुद्दा केवल आर्थिक आंकड़ों का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक संतुलन का भी है। यदि क्रीमी लेयर लागू होती है, तो इससे संभव है कि उन जातियों और परिवारों को लाभ मिले जो अब तक लगातार पिछड़ेपन में दबे रहे हैं। वहीं, इसका विरोध करने वालों का कहना है कि आरक्षण केवल आर्थिक कमजोरी दूर करने का साधन नहीं, बल्कि सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव का सुधारात्मक उपाय है, जिसे केवल आय के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
अब अदालत को यह तय करना है कि क्या आरक्षण व्यवस्था में ऐसा सुधार किया जा सकता है, जिससे उसका लाभ सही मायने में उन्हीं तक पहुंचे, जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है, और क्या इसके लिए क्रीमी लेयर का दायरा एससी-एसटी तक बढ़ाया जाना चाहिए।
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