मुख्यमंत्री ने ‘पर्यावरण से समन्वय’ संगोष्ठी का शुभारंभ, लोक निर्माण विभाग से नवाचार की अपील
भोपाल।
राजधानी के रवींद्र भवन में सोमवार को ‘पर्यावरण से समन्वय’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी-सह प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किया। इस अवसर पर उन्होंने लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारियों और अभियंताओं से पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर नवाचार अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विभाग को अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए केवल परंपरागत ढर्रे पर न चलकर, रचनात्मक और पर्यावरण-संवेदनशील निर्माण कार्यों पर ध्यान देना होगा।

पारंपरिक स्थापत्य और आधुनिक विज्ञान का मेल
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में भारतीय स्थापत्य और जल संरचना के प्राचीन उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि 170 साल पुराने रेल निर्माण से लेकर सिंधु घाटी सभ्यता के अद्भुत नमूने यह प्रमाणित करते हैं कि हमारे देश में स्थापत्य का ज्ञान और तकनीक अनादिकाल से मौजूद रही है। उन्होंने भोपाल के बड़े तालाब का उदाहरण देते हुए बताया कि इसकी संरचना इस तरह से की गई थी कि मुख्य धारा को रोके बिना पानी को संग्रहित किया जाता है और अतिरिक्त पानी को कोलार नदी की ओर मोड़ दिया जाता है। उन्होंने कहा, “यह पुराना विज्ञान आज भी आधुनिक इंजीनियरिंग को चुनौती देता है और लागत कम करने के बेहतरीन तरीके सुझाता है।”
गणित, विज्ञान और तकनीक में सिद्धहस्तता रखने वाला अभियंता कहलाता है। pic.twitter.com/D5LF3V8GR2
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) August 11, 2025
पर्यावरण संरक्षण के उदाहरण
मुख्यमंत्री ने पीडब्ल्यूडी द्वारा किए गए एक नवाचार का उल्लेख किया, जिसमें पुल निर्माण के माध्यम से टाइगर और अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग को सुरक्षित किया गया। उन्होंने इसे “पर्यावरण से तालमेल का श्रेष्ठ उदाहरण” बताते हुए कहा कि विकास कार्य और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते योजना और क्रियान्वयन में संतुलन रखा जाए।

निर्माण सामग्री और योजना पर पुनर्विचार की जरूरत
डॉ. यादव ने कहा कि निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और डिजाइन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उन्होंने पुरानी ग्रामीण वास्तुकला की सराहना करते हुए कहा कि पहले के कच्चे मकान बिना कंक्रीट के भी मौसम की मार सहन कर लेते थे, जबकि आज शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बिना आवश्यकता के बड़े और महंगे निर्माण की होड़ लग गई है। उन्होंने कहा, “गुणवत्ता और सही योजना के बिना निर्माण करना भविष्य के लिए संकट है। यह बात केवल पीडब्ल्यूडी पर ही नहीं, बल्कि पूरे निर्माण क्षेत्र पर लागू होती है।”
लागत और गुणवत्ता पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का पैसा जनता के हित में सर्वोत्तम उपयोग होना चाहिए। “हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि एक रुपए की लागत से सवा रुपए का काम हो,” उन्होंने कहा। उन्होंने डामर की सड़कों के जल्दी खराब होने की समस्या का उल्लेख करते हुए बताया कि जहां सीमेंट की सड़कें बनाई गईं, वे कई वर्षों तक सुरक्षित रहीं। साथ ही, उन्होंने मिट्टी की प्रकृति के अनुसार निर्माण कार्य कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।

एकात्म मानव दर्शन का संदर्भ
डॉ. यादव ने एकात्म मानव दर्शन की 60वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मांड और शरीर में समानता का भाव हमें हर निर्माण में पर्यावरण और मानवीय हित को प्राथमिकता देने की सीख देता है। उन्होंने कहा, “हर सांस के साथ महाकाल हमारे जीवन में विद्यमान हैं, इसलिए हर काम परमात्मा के प्रति जवाबदेही के भाव से होना चाहिए।”
संगोष्ठी का उद्देश्य
इस संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों और समाजसेवियों को आमंत्रित किया गया, ताकि अभियंता और अधिकारी पर्यावरण-संवेदनशील तकनीकों और टिकाऊ निर्माण के तरीकों पर खुलकर चर्चा कर सकें। मुख्यमंत्री ने लोक निर्माण मंत्री और विभाग को इस पहल के लिए बधाई दी और उम्मीद जताई कि इस कार्यशाला से नए विचार और नीतियां निकलेंगी जो आने वाले वर्षों में राज्य के निर्माण कार्यों को दिशा देंगी।
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