August 30, 2025 5:58 PM

अन्याय से बचाने के लिए अदालत को खुद साक्ष्य जुटाने चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

supreme-court-refuses-to-stay-voter-verification-in-bihar

: हाईकोर्ट का अहम फैसला: अन्याय रोकने के लिए अदालत स्वयं जुटाए साक्ष्य

प्रयागराज।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायालय का यह दायित्व बनता है कि वह स्वयं साक्ष्य एकत्र करने की दिशा में जरूरी कदम उठाए, ताकि किसी पक्ष के साथ अन्याय न हो। यह टिप्पणी एक 80 वर्षीय बीमार महिला द्वारा दाखिल राजीनामा के सत्यापन में उत्पन्न समस्या को देखते हुए की गई।

🔎 मामला क्या है?

यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने एक द्वितीय अपील की सुनवाई के दौरान पारित किया, जो कि राधा कृष्ण शर्मा द्वारा दाखिल की गई थी। मामले में एक पक्षकार जया पुरोहित ने राजीनामा दाखिल किया था, लेकिन बीमारी के कारण वह अदालत में पेश नहीं हो पा रही थीं, जिससे दस्तावेज का सत्यापन अधूरा रह गया।

⚖️ सिविल जज की रिपोर्ट और कोर्ट की प्रतिक्रिया

इससे पहले झांसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दिव्या चौधरी ने उच्च न्यायालय में रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसमें बताया गया कि कई प्रयासों के बावजूद जया पुरोहित द्वारा प्रस्तुत राजीनामा सत्यापित नहीं हो पाया। कोर्ट की नोटिस तामील हो चुकी है, लेकिन न तो जया पुरोहित स्वयं उपस्थित हुईं, न ही उनके वकील के माध्यम से कोई पुष्टि की गई।

जया पुरोहित की ओर से यह बताया गया कि वह 80 वर्ष की वृद्ध और गंभीर रूप से बीमार हैं, जिस कारण अदालत में उपस्थित नहीं हो पा रही हैं। ऐसे में राजीनामा का सत्यापन अटका हुआ है।

📝 हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

इस स्थिति को गंभीर मानते हुए जस्टिस यादव ने आदेश दिया कि सिविल जज (सीनियर डिवीजन) झांसी, मध्यप्रदेश के होशंगाबाद क्षेत्र के क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट को एक अनुरोध पत्र भेजें। इस पत्र के माध्यम से कहा जाए कि वे एक सप्ताह के भीतर जया पुरोहित से संपर्क कर उनका राजीनामा सत्यापित करें और अगली सुनवाई की तिथि से पहले रिपोर्ट उच्च न्यायालय को भेजें।

📅 अगली सुनवाई की तारीख तय

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्याय के हित में कोर्ट को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए, बल्कि जब आवश्यक हो तो उसे स्वतः साक्ष्य जुटाने के उपाय भी करने चाहिए। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई की तिथि 28 जुलाई निर्धारित की है।


🔍 क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि न्यायपालिका केवल प्रस्तुत तथ्यों पर निर्भर नहीं रह सकती, खासकर जब मामला वृद्ध, असहाय या बीमार व्यक्ति से जुड़ा हो। ऐसे मामलों में न्यायालय की सक्रिय भूमिका आवश्यक है ताकि अन्याय की संभावना शून्य हो सके।



Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on whatsapp
Share on telegram