अमेरिका ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया, पीएम मोदी बोले – आत्मनिर्भरता ही असली ताकत
नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में नई तल्खी देखने को मिली है। अमेरिका ने रूस से भारत की तेल खरीद को बहाना बनाते हुए भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया है। पहले से लागू 25% शुल्क के साथ अब भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में कुल 50% आयात शुल्क चुकाना होगा। वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, जूते, खेल के सामान, फर्नीचर और रसायन जैसे उत्पाद इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
यह दर अमेरिका की ओर से किसी भी देश पर लगाए गए सबसे ऊंचे टैरिफ में गिनी जा रही है। इसे ब्राजील और चीन पर लगाए गए शुल्क के बराबर माना जा रहा है।

पीएम मोदी का जवाब – “दबाव झेलने की क्षमता है”
गुजरात के गांधीनगर में इस मुद्दे पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा,
“आज की दुनिया आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति से चल रही है। सब अपने-अपने हित साधने में लगे हैं। हम पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन हम इसे सहन कर लेंगे। आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी ही हमारे लिए विकसित भारत की सच्ची नींव हैं।”
पीएम मोदी ने यह भी कहा कि छोटे उद्यमियों, किसानों, दुकानदारों और पशुपालकों के हितों की रक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने जापान जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत में विदेशी निवेश भी स्वदेशी ही है, क्योंकि इसमें भारतीय श्रमिकों का पसीना शामिल है।
भारत-अमेरिका बातचीत का रास्ता खुला
हालांकि, सरकार से जुड़े सूत्रों ने साफ किया है कि इस मसले को सुलझाने के लिए भारत और अमेरिका के बीच संचार चैनल खुले हुए हैं। सूत्रों के मुताबिक, यह स्थिति स्थायी नहीं है बल्कि दीर्घकालिक संबंधों का अस्थायी चरण है। उनका मानना है कि भारत का निर्यात ढांचा इतना विविध है कि इस अतिरिक्त शुल्क का असर उतना गंभीर नहीं होगा, जितना अंदेशा जताया जा रहा है।
टैरिफ का असर और भारत की संभावनाएं
आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह फैसला भारत के लिए तात्कालिक झटका है, लेकिन लंबे समय में भारत के पास जवाबी विकल्प मौजूद हैं।
- विविध निर्यात संरचना – भारत के पास वस्त्र और आभूषण के अलावा औषधि, आईटी सेवाएं, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ऑटो पार्ट्स और कृषि उत्पादों जैसे कई निर्यात साधन हैं। अमेरिका का दबाव इन्हें प्रभावित नहीं कर पाएगा।
- आंतरिक मांग की ताकत – भारत का घरेलू बाजार तेजी से बढ़ रहा है। युवा आबादी और उभरता मध्यम वर्ग इसे और मजबूत बना रहे हैं। यह आयात-निर्यात की असमानता को संतुलित करने में सहायक है।
- वैकल्पिक साझेदारी – हाल के वर्षों में भारत ने यूरोप, खाड़ी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत किए हैं। टैरिफ संकट भारत को इन बाजारों पर और ध्यान केंद्रित करने का मौका देगा।
- ऊर्जा और रक्षा सहयोग – अमेरिका भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और टेक्नोलॉजी का बड़ा सहयोगी है। ऐसे में व्यापारिक विवाद दोनों देशों को मजबूर करेगा कि वे वार्ता के जरिए समाधान खोजें।
वैश्विक राजनीति की झलक
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह टैरिफ विवाद केवल व्यापार का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसमें भू-राजनीतिक समीकरण भी जुड़े हैं। अमेरिका रूस पर दबाव बनाने की कोशिश में है और भारत को भी उसी खेमे में लाना चाहता है। लेकिन भारत की नीति “रणनीतिक स्वायत्तता” पर आधारित है, जिसमें वह किसी भी वैश्विक दबाव में झुकना नहीं चाहता।
आगे की राह
भारत सरकार का जोर इस समय दो मोर्चों पर है—
- आत्मनिर्भर भारत को और मज़बूत करना ताकि बाहरी दबावों का असर कम हो।
- कूटनीतिक वार्ता के जरिए अमेरिका से समाधान निकालना।
इतिहास गवाह है कि भारत ने हर बड़ी चुनौती से उबरकर ही अपनी स्थिति मजबूत की है। चाहे 1991 की आर्थिक संकट की घड़ी रही हो या 2020 का कोविड संकट, भारत ने न सिर्फ झटकों को झेला बल्कि और मजबूत बनकर उभरा। यही संघर्षशीलता भारत की असली ताकत है।
अमेरिका का यह टैरिफ निर्णय भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों में तनाव की निशानी है। लेकिन भारत की आर्थिक विविधता, घरेलू बाजार की ताकत, वैकल्पिक साझेदारियां और आत्मनिर्भरता की नीति यह साबित करती है कि भारत इस दबाव को झेलने के साथ-साथ इसका माकूल जवाब देने में भी सक्षम है।
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