उज्जैन में शुरू हुआ द्वितीय वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन सम्मेलन ‘रूह मेंटिक’, जानें गजेंद्र सिंह और सीएम मोहन यादव ने क्या कहा
उज्जैन। आध्यात्म और पर्यटन के संगम की नगरी उज्जैन में मंगलवार को द्वितीय वैश्विक आध्यात्मिक पर्यटन सम्मेलन ‘रूह मेंटिक’ का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन बाबा महाकाल की नगरी में हुआ, जहां देश और दुनिया से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

भारत की संस्कृति 2000 वर्षों से अखंड: गजेंद्र सिंह शेखावत
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने अपने संबोधन में कहा कि मध्यप्रदेश को ‘विकसित भारत के ग्रोथ इंजन’ के रूप में तैयार करने का कार्य मुख्यमंत्री मोहन यादव कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति इतनी गहरी और मजबूत है कि हजारों साल के आक्रमण और कुत्सित प्रयासों के बावजूद यह अपने मूल स्वरूप में बनी हुई है।
उन्होंने आदि शंकराचार्य का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने दो हजार साल पहले केरल से केदारनाथ तक 28 हजार किमी की पदयात्रा करके देश को एक सूत्र में पिरोया और चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना कर ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का निर्माण किया।
गजेंद्र सिंह ने कहा—
- अंग्रेजों से पहले भी भारत अखंड था, लेकिन दुषित मानसिकता वालों ने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया।
- कुंभ मेले में मिले प्रमाण इस बात को साबित करते हैं कि भारत एक आध्यात्मिक सूत्र से हमेशा से जुड़ा रहा है।
- भारत में तीर्थाटन की परंपरा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक रही है।

मंदिर लोकतंत्र के मंदिरों का आदर्श: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में कहा कि भारत के देवालय (मंदिर) लोकतंत्र के सच्चे आदर्श हैं।
उन्होंने कहा—
- 84 खंभों वाला विक्रमादित्य कालीन मंदिर, जिसे बाबर ने ध्वस्त किया था, उसका स्थापत्य कला स्वरूप आज भी लोकतंत्र की नींव है।
- नई लोकसभा का निर्माण बीजापुर मंडल के मंदिर की स्थापत्य शैली पर आधारित है।
- पुरानी संसद भवन का निर्माण मंडावली-पिटावली मंदिर के स्थापत्य स्वरूप पर आधारित था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और जनकल्याण की प्रेरणा देने वाले केंद्र भी हैं।

आध्यात्मिकता की कोई सीमा नहीं
मुख्यमंत्री ने कहा कि दुनिया में देशों की सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन आध्यात्मिक जीवन की कोई सीमाएं नहीं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बामियान (अफगानिस्तान) में बुद्ध प्रतिमाओं पर दागे गए तोप के गोले वास्तव में भारत की आत्मा पर आघात थे, क्योंकि उनका निर्माण भारतीय संस्कृति से प्रेरित होकर हुआ था।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति “जीयो और जीने दो, खाओ और खिलाओ” की मूल भावना पर आधारित है।
मंदिरों में भगवान का स्थान छोटा होता है लेकिन भक्तों और सामाजिक गतिविधियों के लिए विशाल प्रांगण बनाए जाते हैं। यही हमारी संस्कृति की विशिष्टता और समावेशिता है।

धार्मिक पर्यटन से जुड़ेगा विकास
मुख्यमंत्री ने कहा कि उज्जैन का महाकाल लोक परिसर, जो करीब एक हजार बीघा क्षेत्र में फैला है, विश्व में अद्वितीय है।
उन्होंने कहा कि धार्मिक नगरियां केवल आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि पर्यटन और आर्थिक विकास का बड़ा माध्यम भी हैं।
कार्यक्रम का उद्देश्य यही है कि भारत की आध्यात्मिक और स्थापत्य धरोहर को वैश्विक स्तर पर परिचित कराया जाए और पर्यटन के जरिए समाज का विकास हो।
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