आरएसएस की 100 वर्ष की यात्रा: डॉ. मोहन भागवत ने कहा भारत के विश्व गुरु बनने में है संघ की सार्थकता
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मंगलवार को विज्ञान भवन, दिल्ली में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े लोगों के साथ संवाद किया। यह संवाद कार्यक्रम संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर केंद्रित है, जिसका विषय रखा गया है – “100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज”। तीन दिवसीय इस आयोजन की शुरुआत करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि भारत के विश्व गुरु बनने की प्रक्रिया में संघ की सार्थकता निहित है।

संघ की 100 वर्ष की यात्रा पर संवाद
डॉ. भागवत ने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र का विश्व में अपना योगदान होता है और संघ का उद्देश्य भारत को उसके विश्वगुरु स्थान पर पहुँचाना है। उन्होंने माना कि भारत के उत्थान की गति धीमी है, परंतु यह निरंतर जारी है। उन्होंने कहा कि यह संवाद केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के अन्य तीन स्थानों पर भी होगा, ताकि अधिकाधिक लोग इससे जुड़ सकें।
उन्होंने बताया कि इस संवाद में 70 से 75 प्रतिशत प्रतिभागियों को नए लोगों में से आमंत्रित किया गया है। उद्देश्य है कि संघ की सही जानकारी अधिक लोगों तक पहुंचे।
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— विश्व संवाद केंद्र,जोधपुर प्रान्त (@samvadJodhpur) August 26, 2025
संघ को लेकर भ्रांतियाँ और तथ्य
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ के बारे में कई प्रकार की चर्चाएँ होती हैं, परंतु प्रामाणिक जानकारी का अभाव है। जो जानकारी उपलब्ध है, वह भी अक्सर धारणाओं पर आधारित होती है। उन्होंने स्पष्ट किया –
- “हमारा उद्देश्य किसी को मनवाना नहीं, बल्कि सही तथ्य रखना है।”
- “निष्कर्ष निकालना श्रोताओं का अधिकार है।”
उन्होंने 2018 में विज्ञान भवन में हुए संवाद की याद दिलाते हुए कहा कि तब भी यही भाव था कि संघ के बारे में तथ्यात्मक जानकारी दी जाए। इस बार का संवाद 100 वर्षों की यात्रा के बाद संगठन की आगे की दिशा पर केंद्रित है।
राष्ट्र ही सर्वोपरि
संघ के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि संघ क्यों शुरू हुआ, कैसे बाधाओं के बीच स्वयंसेवकों ने इसे आगे बढ़ाया और 100 साल बाद भी नए क्षितिज की बात क्यों हो रही है – इसका उत्तर संघ की प्रार्थना की अंतिम पंक्ति में है: “भारत माता की जय”। उन्होंने कहा –
- “अपना देश है, उसकी जय-जयकार होनी चाहिए।”
- “भारत को विश्व में अग्रणी स्थान मिलना चाहिए।”
डॉ. हेडगेवार की प्रेरणा
डॉ. भागवत ने बताया कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना इसलिए की, क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान समाज निर्माण का कार्य अधूरा रह गया था। उन्होंने अनुभव किया कि समाज को दिशा देने का दायित्व कोई नहीं उठा रहा, इसलिए उन्होंने पहल की और 1925 की विजयादशमी को संघ की स्थापना की।
डॉ. भागवत ने कहा –
- “डॉ. हेडगेवार का मानना था कि संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन ही राष्ट्र निर्माण का आधार है।”
- “जो अपने नाम के साथ ‘हिंदू’ जोड़ता है, वह समाज और देश के प्रति जिम्मेदार बनता है।”
हिंदू शब्द का व्यापक दृष्टिकोण
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू’ शब्द किसी बाहरी पहचान का प्रतीक नहीं, बल्कि एक व्यापक मानवशास्त्रीय दृष्टिकोण है। भारतीय परंपरा व्यक्ति, समाज और सृष्टि को एक-दूसरे से जुड़ा मानती है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक विकास वही है जो व्यक्तिगत उन्नति के साथ समाज और सृष्टि के उत्थान को भी साथ लेकर चले।
डॉ. हेडगेवार का देशभक्ति भाव
डॉ. भागवत ने हेडगेवार के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे जन्मजात देशभक्त थे। कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उनका संबंध अनुशीलन समिति से हुआ था। रासबिहारी बोस और त्रिलोक्यानाथ की क्रांतिकारी पुस्तकों में उनका नाम ‘कोकीन’ के रूप में आता है।
समाज परिवर्तन ही लक्ष्य
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत में हिंदू, सिख और बौद्ध आपस में संघर्ष नहीं करेंगे, बल्कि राष्ट्र के लिए जीएंगे और बलिदान देंगे।
उन्होंने कहा –
- “नेता, नीति और पार्टी सहायक तत्व हैं, लेकिन मूल कार्य समाज का परिवर्तन है।”
- “भारत माता ने अपने बच्चों को संस्कार दिए हैं, जिनके लिए पूर्वजों ने बलिदान दिए। वही पूर्वज संघ के प्रेरणा स्रोत हैं।”
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