विपक्ष के उप राष्ट्रपति उम्मीदवार पर अमित शाह का हमला, सलवा जुडूम पर टिप्पणी से जिंदा रहा नक्सलवाद
नई दिल्ली। उप राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सियासी हलचल के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष के उम्मीदवार और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी पर सीधा हमला बोला है। शाह ने कहा कि रेड्डी की 2011 में दी गई उस टिप्पणी के कारण नक्सलवाद, जो लगभग समाप्त होने की कगार पर था, दो दशक तक और जिंदा रहा। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर विपक्ष ने ऐसे व्यक्ति को क्यों चुना, जिसकी टिप्पणी ने नक्सलियों को बचाने का काम किया।
अमित शाह ने कहा कि उस समय न्यायमूर्ति रेड्डी और न्यायमूर्ति एसएस निज्जर की खंडपीठ ने छत्तीसगढ़ में चल रहे सलवा जुडूम अभियान को असंवैधानिक और अवैध करार दिया था। इसके बाद राज्य सरकार को यह अभियान बंद करना पड़ा। शाह का कहना था कि यह आदेश नक्सलियों के लिए संजीवनी साबित हुआ और सुरक्षा बलों को पीछे हटना पड़ा। नतीजतन, नक्सली दोबारा सक्रिय हो गए और ग्रामीणों की सुरक्षा कमजोर हो गई।
शाह ने कटाक्ष करते हुए कहा, “राहुल गांधी और विपक्ष को बताना चाहिए कि आखिर क्यों उन्होंने ऐसे व्यक्ति को उप राष्ट्रपति पद के लिए चुना, जिसकी टिप्पणी के कारण हजारों ग्रामीणों की जान जोखिम में पड़ी और नक्सलवाद को बढ़ावा मिला।”

क्या था सलवा जुडूम?
सलवा जुडूम दरअसल छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा नक्सलियों के खिलाफ शुरू किया गया आंदोलन था। सलवा जुडूम का अर्थ होता है “शांति यात्रा”। यह आंदोलन पूरी तरह स्वस्फूर्त था, जिसमें ग्रामीणों ने नक्सलियों से बचने के लिए सुरक्षा शिविर बनाए।
बाद में इस आंदोलन को राज्य और केंद्र सरकार का सहयोग मिला। 2005 से 2011 तक यह आंदोलन नक्सलियों के खिलाफ मजबूत मोर्चा बन गया। सरकार ने आंदोलन से जुड़े युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) के रूप में नियुक्त किया और उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया गया।
कई जगहों पर नक्सलियों ने इन शिविरों पर हमले किए, लेकिन स्थानीय ग्रामीण डटे रहे और नक्सली कमजोर होते गए। यही कारण था कि नक्सली समर्थक और वामपंथी विचारधारा वाले संगठनों ने इस अभियान को खत्म करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला और असर
साल 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस अभियान को असंवैधानिक बताते हुए बंद करने का आदेश दिया। अदालत का कहना था कि यह व्यवस्था आदिवासियों और युवाओं को हथियारों के बीच झोंकने जैसा है, जो संविधान की भावना के खिलाफ है।
अमित शाह का कहना है कि इसी आदेश से ग्रामीणों के आत्मरक्षा के अधिकार को छीना गया और नक्सलियों को दोबारा जड़ जमाने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि अगर सलवा जुडूम को जारी रहने दिया जाता तो शायद नक्सलवाद अब तक खत्म हो चुका होता।
राजनीतिक बहस गरमाई
अमित शाह की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। भाजपा इसे विपक्ष की “गलत सोच” और “देश विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने” की मिसाल बता रही है। वहीं विपक्ष की ओर से कहा जा रहा है कि भाजपा चुनावी फायदे के लिए मुद्दों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रही है।
गौरतलब है कि उप राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष ने बी. सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाया है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर अब भाजपा लगातार हमलावर है और इसे नक्सलवाद से जोड़कर जनता के सामने पेश कर रही है।
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