वक्फ संशोधन विधेयक आखिरकार जोरदार हंगामे के बाद संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा से बहुमत के साथ पारित हो गया है। अब यह राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद कानून बन जाएगा। इसे लेकर कांग्रेस समेत कई पार्टियों ने विरोध जताया था। यह भी दावे किए गए कि सरकार के पास इतना बहुमत नहीं है कि वह इस विधेयक को पारित करा पाए। लेकिन सरकार ने अपने प्रबंधन कौशल का प्रदर्शन भी किया और यह भी संदेश दिया कि एनडीए की सरकार में कोई बिखराव नहीं है। सभी सहयोगी दल एकजुट हैं। वक्फ संशोधन विधेयक को दोनों सदनों में पारित कराकर मोदी सरकार ने यह भी संदेश दिया है कि यह सरकार आज भी उतनी ही सशक्त है, जितनी पिछले दो कार्यकाल में रही है। 99 सीट पाकर कांग्रेस अपने को विजेता समझ रही थी, उसे भी ध्यान आया होगा कि सदन में अब भी एनडीए ही शक्ति के केंद्र में है। बहरहाल, वक्फ संशोधन विधेयक पर चर्चा से यह तो स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति से बाहर नहीं आ पाए हैं। हालांकि, यहां यह भी समझना होगा कि ये राजनीतिक दल मुसलमानों में प्रभुत्ववादी वर्ग के साथ ही खड़े होते हैं। इन्होंने कभी भी पसमांदा और दूसरे पिछड़े मुसलमानों के हित की चिंता नहीं की। मुस्लिम महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए भी ये दल सामने नहीं आये हैं। शाहबानो प्रकरण से लेकर तीन तलाक कानून तक इस बात के साक्ष्य मिलते हैं। वक्फ संशोधन विधेयक ने वक्फ में पिछड़े मुस्लिम वर्गों और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की है। इसलिए जिन राजनीतिक दलों ने इस कानून का विरोध किया है, एक तरह से उन्होंने महिलाओं के हितों पर प्रहार किया है। पीछे छूट गए मुस्लिम बंधु आगे आएं, इस दृष्टिकोण का भी अभाव दिखाई देता है। कट्टरपंथी मुस्लिम वर्ग के दबाव में ये राजनीतिक दल झुके हुए नज़र आते हैं। संसद में असफल होने के बाद भी कांग्रेस अपना मुस्लिम परस्ती को दिखाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का साहस दिखाने वाली है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी इस मुद्दे को लेकर सर्वोच्च न्यायालय जाएगी और इस विधेयक की वैधता को चुनौती देगी। कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी न्यायालय में इस विधेयक को चुनौती देने की बात कही है। हालांकि, इस बात की संभावना कम ही है कि सर्वोच्च न्यायालय विधेयक को रोकेगा। अनुच्छेद-370 के मामले में भी न्यायालय ने विरोधियों को आईना दिखाया था। भला पारदर्शिता बढ़ाने और सर्वसमावेशी कानून को न्यायपालिका क्यों रद्द करेगी? लेकिन, कांग्रेस के इस कदम से एक बार फिर यह तो स्थापित की हो जाएगा कि मुस्लिम तुष्टिकरण ही कांग्रेस की प्राथमिक चिंता है। क्योंकि एक भी ऐसा प्रकरण ध्यान नहीं आता है जब हिंदुओं के हितों की चिंता में कांग्रेस न्यायालय गई हो।